स्थानीय जरूरतों पर आधारित नीतियां और लगातार मूल्यांकन से ही होगा विकास: प्रो. राजेंद्र ममगाईं

स्थानीय जरूरतों पर आधारित नीतियां और लगातार मूल्यांकन से ही होगा विकास: प्रो. राजेंद्र ममगाईं
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देहरादून।दून विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के द्वारा एक सेमिनार का सफल आयोजन किया गया जिसका मुख्य उद्देश्य के तहत इस बात की चर्चा की गई कि किसी भी विकास नीति या योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह स्थानीय जरूरतों और जमीनी वास्तविकताओं को कितना समझती और संबोधित करती है।

केवल बड़े स्तर की नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं होता, जब तक वे क्षेत्र विशेष की समस्याओं, परिस्थितियों और स्थानीय कार्यप्रणालियों को ध्यान में न रखा जाए। विशेष रूप से उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां भौगोलिक, आर्थिक, पारिस्थितिक और सांस्कृतिक विविधता बहुत अधिक है, वहां स्थानीय जरूरतों के अनुसार नीतियां बनाना बेहद जरूरी है।
प्रो. राजेंद्र ममगाईं, डीन, स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज, दून यूनिवर्सिटी ने “उत्तराखंड में समकालीन विकास संबंधी चिंताएं: चिंतन और रणनीतियां” विषय पर आयोजित एक सेमिनार में कहा की पर्वतीय राज्यों की विशिष्ट विकास आवश्यकताओं को पूरा करने में वर्तमान नीतिगत ढांचे की खूबियों और सीमाओं पर विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता है। उत्तराखंड के विकास की योजना केवल एक समान नीति मॉडल पर आधारित नहीं हो सकती। इसके लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप हस्तक्षेप और योजनाओं की लगातार समीक्षा तथा फीडबैक व्यवस्था जरूरी है।

प्रो. ममगाईं ने राज्य के सामने मौजूद कई महत्वपूर्ण नीतिगत चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों के बीच क्षेत्रीय असमानताएं लगातार बढ़ रही हैं। महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ने के बावजूद उनकी आय अब भी कम बनी हुई है। स्किल डेवलपमेंट के क्षेत्र में अकादमिक संस्थानों और उद्योगों के बीच मजबूत तालमेल की कमी है। इसके अलावा सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के विस्तार के बावजूद गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं की सक्रिय निगरानी और मूल्यांकन आवश्यक है ताकि नीतियां समय के साथ प्रभावी और प्रासंगिक बनी रहें।


इस अवसर पर उत्तराखंड के सेतु आयोग के सलाहकार हनुमंथ रावत ने राज्य में सतत आर्थिक विकास, रोजगार सृजन, पर्यावरण संरक्षण और समावेशी विकास को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों के लिए ऐसे नवीन प्रशासनिक मॉडल विकसित करने की जरूरत है जो पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका के अवसर भी तैयार करें।

मुख्य वक्तव्य देते हुए स्टॉकहोम स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, स्वीडन की शोधकर्ता गार्गी डंगवाल ने वैश्विक स्तर पर सामने आ रही विकास संबंधी चुनौतियों और बढ़ती असमानताओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि वर्तमान नीतिगत प्राथमिकताओं में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से लोगों के जीवन और आजीविका की सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण, टिकाऊ बुनियादी ढांचे और हरित विकास रणनीतियों में अधिक निवेश की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण (RCTs) पर आधारित नीतियां और योजनाएं अक्सर लक्षित समूहों के लिए अधिक गहरे और लंबे समय तक सकारात्मक परिणाम देती हैं।
सेमिनार के दौरान उत्तराखंड में वर्तमान आजीविका संवर्धन मॉडलों के मूल्यांकन की आवश्यकता पर भी विस्तार से चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने जिम्मेदार और पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देने, हल्के लेकिन उच्च मूल्य वाले स्थानीय उत्पादों और सेवाओं को प्रोत्साहित करने, स्थानीय क्षेत्रीय विकास के लिए अनुसंधान एवं विकास को मजबूत बनाने तथा गुणवत्ता मानकों और आर्थिक न्याय के माध्यम से स्थानीय वैल्यू चेन को वैश्विक बाजारों से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।

वक्ताओं ने सामूहिक रूप से कहा कि उत्तराखंड की संवेदनशील पारिस्थितिकी और पहाड़ी परिस्थितियों के अनुरूप व्यावहारिक और टिकाऊ विकास समाधान तैयार करने के लिए सरकार, शैक्षणिक संस्थानों, नागरिक समाज और स्थानीय समुदायों के बीच सहयोग अत्यंत आवश्यक है।
सेमिनार के समापन पर डॉ. अंकित नगर ने सभी वक्ताओं और प्रतिभागियों का धन्यवाद किया तथा उत्तराखंड के सतत और समावेशी विकास से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक संवाद को आगे बढ़ाने के लिए दून इकोनॉमिक फोरम की प्रतिबद्धता दोहराई।

इस अवसर पर डॉ. राहुल सक्सेना, डॉ. श्वाती, डॉ. गीतू शर्मा तथा विभाग के छात्र-छात्राएं भी उपस्थित रहे।

देवभूमि खबर

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