आंदोलनकारियों की अनदेखी मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र पर पड़ी भारी
रिपोर्ट ।ललित जोशी
नैनीताल। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के इस्तीफे के बाद आंदोलनकारियों में एक नयी उम्मीद जग गई है। यहाँ बता दे चार साल 9 दिन का कार्यकाल श्री रावत का रहा पर कभी भी राज्य आंदोलनकारियों की बात नही की।जबकि उत्तराखंड राज्य आंदोलन कारियों के बलिदान से मिला।उन्हीं आंदोलन कारियों को पूछा तक नही गया।जबकि राज्य आंदोलन कारियों को अलग अलग स्तर पर रखकर पेंशन दी जा रही थी। इतनी महगाई बड़ी पर मुख्यमंत्री ने आंदोलन कारियों की पेंशन तक नही बड़ाई। 10% आरक्षण का मामला ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। चिन्हीकरण का कोई नाम लेवा तक नहीं लिया गया।2017 से राज्य आंदोलन कारी चिन्हीकरण की मांग कर रहे थे।
यहाँ तक कभी भी उत्तराखंड राज्य आंदोलन कारी का नाम लेना तक मुख्यमंत्री अपनी जुबा पर लेना नागवार समझते थे। यहाँ तक की पौड़ी गढ़वाल में 155 दिन से ऊपर हो गये धरना प्रदर्शन करते हुए एक प्रतिनिधि को वहाँ भेजना मुख्यमंत्री ने उचित नहीं समझा। अपनी मांगों को माँगने के लिए मातृ शक्ति पर अन्याय किया जाना यह भी मुख्यमंत्री को राश नही आया। जिसे कुमाऊँ की शान कहे जाने वाले अल्मोड़ा जिले को कुमाऊँ मंडल से अलग कर नये मंडल में मिलाना भी मुख्यमंत्री की नया को डुबोने में कामयाब रहा।जो भी मुख्यमंत्री बने अगर राज्य आंदोलन कारी चिन्हीकरण, एक समान पेंशन ,व पौड़ी में बैठे राज्य आंदोलन कारियों की बात सुन कर समस्या का हल करें तो कुछ ठीक हो सकता है।यहाँ बता दे आने वाले मुख्यमंत्री को भी कई चुनौती के द्वार से गुजरना पड़ेगा। जबकि 18 मार्च को पूरा चार साल भाजपा सरकार को होने जा रहे थे।यहां इस बात को भी बताना चाहता हूँ केवल पाँच साल उत्तराखंड सरकार को नारायण दत्त तिवारी चला पाये।

