आय से अधिक संपत्ति मामले में पूर्व आबकारी अधिकारी पिता को पांच और बेटी को तीन वर्ष का कठोर कारावास , पांच संपत्तियां होंगी जब्त

बेंगलुरु। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के बेंगलुरु क्षेत्रीय कार्यालय को धनशोधन के एक मामले में बड़ी सफलता मिली है। बेंगलुरु की विशेष अदालत ने सेवानिवृत्त आबकारी रक्षक एवं प्रभारी उपनिरीक्षक एम. रामचंद्र और उनकी बेटी आर. युरेखा को धनशोधन निवारण अधिनियम, 2002 के तहत दोषी करार देते हुए सजा सुनाई है। अदालत ने दोनों की पांच अचल संपत्तियों को केंद्र सरकार के पक्ष में जब्त करने का भी आदेश दिया है। यह फैसला 14 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया।
47वें अतिरिक्त नगर सिविल एवं सत्र न्यायाधीश तथा सीबीआई मामलों के विशेष न्यायाधीश, बेंगलुरु (सीसीएच-48) की अदालत ने एम. रामचंद्र को पांच वर्ष के कठोर कारावास और पांच लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। वहीं, उनकी बेटी आर. युरेखा को तीन वर्ष के कठोर कारावास और तीन लाख रुपये के जुर्माने से दंडित किया गया। जुर्माना अदा नहीं करने की स्थिति में अदालत ने अतिरिक्त साधारण कारावास का प्रावधान भी किया है।
आय से अधिक संपत्ति से जुड़ा है मामला
यह मामला कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस की ओर से सात जुलाई 2009 को दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है। इसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(ई) और 13(2) के तहत आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोपों की जांच की गई थी। इसके बाद ईडी ने 26 अक्टूबर 2009 को धनशोधन का मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
लोकायुक्त की जांच में एक जुलाई 1977 से आठ जुलाई 2009 तक की अवधि की संपत्ति और आय का आकलन किया गया। ईडी ने 23 मार्च 2016 के अस्थायी कुर्की आदेश के तहत करीब 1.09 करोड़ रुपये मूल्य की आठ संपत्तियों को कुर्क किया और जून 2016 में अदालत में अभियोजन शिकायत दाखिल की।
इस मामले से जुड़े मूल भ्रष्टाचार प्रकरण में आठ नवंबर 2024 को फैसला सुनाया गया था। उस मामले में एम. रामचंद्र को दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास और 50 लाख रुपये के जुर्माने की सजा दी गई थी। अदालत ने उनकी ज्ञात आय के मुकाबले 42,48,188.50 रुपये की अनुपातहीन संपत्ति का आकलन किया था, जो उनकी ज्ञात आय का 97.75 प्रतिशत थी।
बेटी के नाम संपत्ति रखने पर भी ठहराया जिम्मेदार
ईडी की जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विशेष अदालत ने माना कि दोनों आरोपियों के खिलाफ धनशोधन का अपराध संदेह से परे साबित हुआ। अदालत ने कहा कि आरोपियों की ओर से संपत्तियों के स्रोत के संबंध में दिए गए स्पष्टीकरण के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए। इनमें विजयनगर में निर्माण के लिए मां से धन मिलने और शारदा द्वारा भूखंड खरीदे जाने संबंधी दावे भी शामिल थे।
अदालत ने माना कि आर. युरेखा ने अपराध से अर्जित धन से खरीदी गई संपत्ति को अपने नाम पर रखने में जानकारी के साथ भूमिका निभाई। इसलिए उन्हें भी धनशोधन के अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। अदालत ने धनशोधन निवारण अधिनियम की धारा 24 के तहत लागू साक्ष्य संबंधी अनुमान का भी उल्लेख किया और कहा कि आरोपी उसे खारिज करने में सफल नहीं रहे।
फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि आय से अधिक संपत्ति के मामलों में अपराध से अर्जित धन की प्रत्येक राशि को अलग-अलग चिह्नित करना आवश्यक नहीं है। संपत्तियों के आपस में मिल जाने से अपराध की प्रकृति समाप्त नहीं होती। अदालत ने धनशोधन को निरंतर जारी रहने वाला अपराध मानते हुए कहा कि अपराध से अर्जित संपत्ति को अपने पास रखने या उसे वैध संपत्ति के रूप में प्रस्तुत करने की स्थिति में संबंधित गतिविधियां कानून के दायरे में आ सकती हैं।
बचाव पक्ष के गवाह पर भी कार्रवाई के निर्देश
इसी मामले में अदालत ने बचाव पक्ष के गवाह एम. जयराम के विरुद्ध भी कार्रवाई के निर्देश दिए। जयराम ने मुख्य परीक्षण के दौरान कहा था कि वह आरोपी एम. रामचंद्र को नहीं जानते। हालांकि, जिरह के दौरान उन्होंने पारिवारिक संबंध स्वीकार करते हुए अपनी पहले की गवाही को गलत बताया।
ईडी की अर्जी पर 14 अक्टूबर 2026 को पारित अलग आदेश में अदालत ने प्रथम दृष्टया झूठी गवाही का मामला बनता हुआ पाया। इसके बाद नगर सिविल न्यायालय के रजिस्ट्रार को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के तहत झूठी गवाही का मामला दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया गया। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि संबंधित गवाह मूल भ्रष्टाचार मामले में भी गवाही दे चुका है।
अदालत ने इस अपराध को व्यापक सामाजिक प्रभाव वाला आर्थिक अपराध माना। सजा निर्धारित करते समय एम. रामचंद्र की लगभग 72 वर्ष की आयु और आर. युरेखा की पारिवारिक परिस्थितियों को राहत देने वाले पहलुओं के रूप में ध्यान में रखा गया। साथ ही, पांच अचल संपत्तियों को धनशोधन निवारण अधिनियम की धारा 8(5) के तहत केंद्र सरकार के पक्ष में जब्त करने का आदेश दिया गया।


