युवाओं को भाषण नहीं, रोजगार और सम्मान चाहिए: गरिमा मेहरा दसौनी

युवाओं को भाषण नहीं, रोजगार और सम्मान चाहिए: गरिमा मेहरा दसौनी
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देहरादून। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा ‘मुख्यमंत्री युवा विद्यार्थी मंथन’ कार्यक्रम शुरू किए जाने पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि युवाओं से संवाद करना अच्छी पहल है, लेकिन संवाद तभी सार्थक होगा जब सरकार युवाओं की आवाज सड़क से लेकर सचिवालय तक सुने।

दसौनी ने कहा कि सरकार आज युवाओं से ‘मेरे सपनों का उत्तराखंड’ विषय पर निबंध लिखवा रही है, लेकिन उसे उन बेरोजगार युवाओं का दर्द भी याद रखना चाहिए, जो रोजगार और भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। उन्होंने वर्ष 2023 के भर्ती परीक्षा विवाद और बेरोजगार युवाओं के आंदोलन का उल्लेख करते हुए पूछा कि क्या केवल संवाद कार्यक्रम आयोजित करने से उन युवाओं की शिकायतें और उनके जख्म खत्म हो जाएंगे।

उन्होंने सरकार से पूछा कि यदि वह वास्तव में Gen-Z की सोच को समझती है तो रोजगार, पारदर्शी भर्ती और युवाओं के अधिकारों की मांग उठाने पर संवाद के बजाय पुलिस कार्रवाई की स्थिति क्यों बनती है।
दसौनी ने ‘मुख्यमंत्री युवा विद्यार्थी मंथन’ कार्यक्रम को लेकर डिजिटल डिवाइड, छात्रों के डेटा की सुरक्षा, पढ़ाई के समय सरकारी आयोजनों में विद्यार्थियों की भागीदारी और निबंध प्रतियोगिता की अनिवार्यता सहित कई सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों के प्रत्येक विद्यार्थी के पास स्मार्टफोन, पर्याप्त इंटरनेट डेटा और स्थिर नेटवर्क उपलब्ध हो, यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है।

उन्होंने छात्रों के ऑनलाइन फॉर्म के माध्यम से जुटाए जाने वाले निजी डेटा को लेकर भी सरकार से स्पष्ट नीति सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने पूछा कि विद्यार्थियों की निजी जानकारी कहां सुरक्षित रखी जाएगी, कितने समय तक रखी जाएगी और उसका इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए होगा।

कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि ‘मेरे सपनों का उत्तराखंड’ निबंध प्रतियोगिता पूरी तरह स्वैच्छिक होनी चाहिए और बच्चों को स्वतंत्र रूप से सोचने तथा सरकार से सवाल पूछने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि यदि किसी बच्चे के सपनों का उत्तराखंड बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और पेपर लीक से मुक्त है तो क्या वह अपनी बात खुलकर निबंध में लिख सकता है?
दसौनी ने सरकारी स्कूलों के बंद या विलय से जुड़े मुद्दे को भी उठाते हुए कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसी नीतियों का ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों के बच्चों की शिक्षा पर क्या प्रभाव पड़ा है। उन्होंने कहा कि पहाड़ के बच्चे का सपना बेहतर शिक्षा पाने का होना चाहिए, न कि कई किलोमीटर दूर स्कूल तक पहुंचने का।

उन्होंने कहा कि बच्चों से विकसित उत्तराखंड के सपने लिखवाने से पहले सरकार को ऐसा उत्तराखंड तैयार करना चाहिए जहां रोजगार मांगने पर युवाओं पर लाठियां न बरसें, भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक का डर न हो, गांव का बच्चा इंटरनेट के अभाव में पीछे न छूटे और अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंतित न हों।

दसौनी ने कहा कि Gen-Z केवल सोशल मीडिया से जुड़ी पीढ़ी नहीं है, बल्कि यह रोजगार, अवसर, पारदर्शिता, समानता, डिजिटल अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जवाबदेही को समझने वाली पीढ़ी है। उन्होंने कहा कि युवाओं के बीच मुख्यमंत्री का जाना स्वागत योग्य है, लेकिन युवाओं को केवल संवाद नहीं, बल्कि अपने सवालों के ठोस जवाब भी चाहिए।

देवभूमि खबर

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