पारंपरिक धारा-नौलों को मिलेगा नवजीवन, 54 ऐतिहासिक जल स्रोतों के वैज्ञानिक पुनरुद्धार की शुरुआत

पारंपरिक धारा-नौलों को मिलेगा नवजीवन, 54 ऐतिहासिक जल स्रोतों के वैज्ञानिक पुनरुद्धार की शुरुआत
Spread the love

देहरादून। उत्तराखंड की प्राचीन जल विरासत को संरक्षित करने की दिशा में स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (SARRA) ने महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। जलागम प्रबंधन निदेशालय, देहरादून में ‘पारंपरिक धारा-नौलों का वैज्ञानिक, वास्तुकलात्मक संरक्षण एवं पुनरुद्धार’ विषय पर राज्य स्तरीय तकनीकी कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में प्रदेश के सभी 13 जिलों से पहुंचे सामाजिक समन्वयकों और कनिष्ठ अभियंताओं ने प्रतिभाग किया।

SARRA की अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी कहकशां नसीम ने कहा कि धारा-नौले केवल पेयजल के पारंपरिक स्रोत नहीं हैं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और प्राचीन स्थापत्य कला के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि इन ऐतिहासिक जल स्रोतों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। उन्होंने संरक्षण अभियान को जनभागीदारी से जन-आंदोलन का स्वरूप देने का आह्वान किया।

यूकॉस्ट के महानिदेशक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. दुर्गेश पंत ने कहा कि पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार वैज्ञानिक और पारिस्थितिकीय प्रक्रिया है। उन्होंने स्प्रिंगशेड प्रबंधन, जल पुनर्भरण क्षेत्रों के वैज्ञानिक अध्ययन, चाल-खाल और भू-जल वैज्ञानिक तकनीकों के समन्वित उपयोग पर जोर दिया।

कार्यशाला में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के डॉ. नागेंद्र रावत ने ‘जीरो-सीमेंट संरचनात्मक अभियांत्रिकी’ विषय पर तकनीकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्राचीन नौलों में बिना सीमेंट के पत्थरों की कॉर्बेलिंग और भार-वहन तकनीक का इस्तेमाल किया जाता था, जो संरचनाओं को भूकंपीय झटकों से सुरक्षित रखने में सहायक रही है।

विरासत संरक्षण विशेषज्ञ अंजलि भरथरी तथा संरक्षण वास्तुकार ए. विजया ने पारंपरिक निर्माण सामग्री के परीक्षण, स्थल मानचित्रण और अंतरराष्ट्रीय संरक्षण मानकों के संबंध में तकनीकी जानकारी साझा की। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण में मूल संरचना और स्थानीय निर्माण तकनीकों को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

कार्यशाला में प्रथम चरण के तहत राज्य के 54 ऐतिहासिक एवं पारंपरिक धारा-नौलों के वैज्ञानिक पुनरुद्धार की कार्ययोजना प्रस्तुत की गई। कनिष्ठ अभियंताओं को निर्देश दिए गए कि इन जल स्रोतों की मूल पत्थर की चिनाई और ऐतिहासिक संरचना के साथ किसी भी प्रकार की सीमेंट आधारित छेड़छाड़ न की जाए।

वहीं सामाजिक समन्वयकों को जियो-टैगिंग, जीआईएस मानचित्रण और आंकड़ा संग्रहण के साथ ग्राम पंचायतों के सहयोग से जल पुनर्भरण क्षेत्रों में चाल-खाल एवं कंटूर ट्रेंच निर्माण की तकनीकी जानकारी दी गई।

SARRA की इस पहल के माध्यम से उत्तराखंड की प्राचीन जल संस्कृति, पारंपरिक ‘जल मंदिर’ स्थापत्य और आधुनिक भू-जल विज्ञान को एकीकृत करते हुए धारा-नौलों के संरक्षण एवं पुनरुद्धार की दिशा में राज्य स्तरीय आधार तैयार किया जा रहा है।

देवभूमि खबर

Related articles