एमबीईसीएल से जुड़े ठिकानों पर ईडी की छापेमारी, विदेशी मुद्रा लेनदेन और विदेश में संपत्तियों की जांच

एमबीईसीएल से जुड़े ठिकानों पर ईडी की छापेमारी, विदेशी मुद्रा लेनदेन और विदेश में संपत्तियों की जांच
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कोलकाता। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), कोलकाता ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (फेमा) की धारा 37 के तहत 23 सितंबर 2026 को मैकनली भारत इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड (एमबीईसीएल) और उससे जुड़ी संस्थाओं से संबंधित व्यक्तियों के कार्यालय एवं आवासीय परिसरों पर तलाशी अभियान चलाया।

ईडी के अनुसार तलाशी की कार्रवाई संजय पासारी, राजीव पासारी, रवि टोडी और सुधीर सतनालीवाला के आवासीय परिसरों तथा संबंधित संस्थाओं के आधिकारिक परिसरों में की गई। तलाशी के दौरान संदिग्ध विदेशी मुद्रा लेनदेन से संबंधित सामग्री सामने आई है, जिसकी जांच की जा रही है।

जांच में एमबीईसीएल से संबंधित बड़ी मात्रा में निर्यात प्राप्तियों का मामला सामने आया है, जो कंपनी को प्राप्त नहीं हुईं और आज तक बकाया हैं। ये लेनदेन कंपनी के कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) में जाने से पहले के बताए गए हैं। इसके अलावा संजय पासारी के विदेश स्थित कुछ परिसंपत्तियों में कथित लाभकारी स्वामित्व अथवा नियंत्रण से संबंधित सामग्री भी सामने आई है, जिनके कथित रूप से घोषित नहीं किए जाने की आशंका है।

ईडी ने बताया कि जांच में यह भी सामने आया कि एमबीईसीएल की वित्तीय स्थिति को कथित रूप से कमजोर किया गया, जिसके बाद कंपनी को कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया में जाना पड़ा। सीआईआरपी के दौरान करीब ₹6,828 करोड़ के दावे दाखिल किए गए, जिनमें से लगभग ₹5,015 करोड़ के दावे स्वीकार किए गए। ये दावे 16 लेनदारों से संबंधित थे, जिनमें बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाला बैंकों का समूह, अन्य सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के बैंक तथा असुरक्षित और परिचालन संबंधी लेनदार शामिल थे।

इन देनदारियों के मुकाबले केवल ₹441 करोड़ की समाधान योजना मंजूर की गई, जो दाखिल दावों की तुलना में करीब 94 प्रतिशत की कमी थी। समाधान योजना में केवल ₹155 करोड़ की नकद राशि लगाने का प्रावधान था, जिसमें से ₹123 करोड़ का ही वास्तविक भुगतान किया गया। शेष राशि एमबीईसीएल के आंतरिक संसाधनों से जुटाई गई।

जांच में यह भी आरोप सामने आया कि सीआईआरपी के माध्यम से एमबीईसीएल के अधिग्रहण की संरचना इस प्रकार तैयार की गई थी कि संजय पासारी के नेतृत्व वाले विश्वा समूह की वास्तविक वित्तीय भागीदारी और नियंत्रण छिपा रहे। बीटीएल ईपीसी को समाधान आवेदक के रूप में इस्तेमाल किया गया, जिसने अधिग्रहण के लिए मंडल व्यापार प्राइवेट लिमिटेड नामक विशेष प्रयोजन इकाई को नामित किया।

ईडी के अनुसार विश्वा समूह से जुड़े धन को कई संस्थाओं के माध्यम से भेजकर अधिग्रहण के लिए इस्तेमाल किए जाने के संकेत मिले हैं। करीब ₹105 करोड़ की अधिग्रहण राशि संजय पासारी से जुड़ी संस्थाओं से आने और कई मध्यस्थ कंपनियों, जिनमें गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां भी शामिल हैं, के माध्यम से भेजे जाने की जानकारी सामने आई है।

ईडी इस बात की जांच कर रहा है कि क्या इस व्यवस्था के माध्यम से धन के वास्तविक स्रोत और एमबीईसीएल के अधिग्रहण के बाद वास्तविक लाभकारी स्वामित्व एवं नियंत्रण को छिपाया गया तथा क्या इससे दिवाला एवं दिवालियापन संहिता, 2016 की धारा 29ए में निर्धारित पात्रता संबंधी प्रावधानों का उल्लंघन हुआ। मामले में फेमा, 1999 तथा अन्य लागू कानूनों के तहत जांच जारी है।

देवभूमि खबर

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